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शनि के आतंक के पीछे उनकी पत्नी का हाथ है - जानते है सेलिब्रिटी वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्राजी से

StarUpNews:हिन्दी समाचार
मंगलवार, सितंबर 20, 2022 WIB Last Updated 2023-07-07T06:36:23Z
शनि के आतंक के पीछे उनकी पत्नी का हाथ है  - जानते है सेलिब्रिटी वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्राजी से 

सेलिब्रिटी वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा अग्रवाल 
इंटरनेशनल वास्तु अकडेमी 
सिटी प्रेजिडेंट कोलकाता 
यूट्यूब: वास्तुसुमित्रा 

शनि का नाम सुनते ही लोग डरने लगते है और साढ़ेसाती का नाम सुनते ही उपाय और बचाव के लिए जाने कहा कहा घूमते है। 
 किसी ने कहा है हर कामयाब आदमी के पीछे एक स्त्री का हाथ हैं।  पर किसी ने ये नहीं सोचा होगा की किसी खौफनाक आदमी के पीछे बीवी का हाथ होगा।   शनि की दृष्टि भयावह होने के पीछे उनकी पत्नी का दिया हुवा श्राप है । 



इस प्रकार का शाप उनकी धर्मपत्नी ने उन्हें दिया था। पुत्र की आकांक्षा से ऋतधर्म से निवृत्त होकर वह पति के सामने उपस्थित हुई; परन्तु शनि समाधि में लीन थे। नाराज होकर शाप दे दिया कि तुम्हारी दृष्टि निम्न रहेगी तथा जहाँ-जहाँ, दृष्टिपात, करोगे, वहाँ-वहाँ विनाश हो जायेगा। सूर्य के ९ पुत्र थे। 



सभी को एक-एक लोक का अधिपति सूर्य ने बनाया; परन्तु शनि ने सभी लोकों पर आक्रमण कर दिया। सूर्य ने शिव से प्रर्थना कर उद्दण्ड पुत्र को दण्ड देने हेतु निवेदन किया। शिव एवं शनि में घोर युद्ध हुआ और अन्त में शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोला। पुत्रमोह में सूर्य ने शनि का बचाव किया और शनि ने शिव की अधीनता स्वीकार कर ली ।  शिव ने शनि को दण्डाधिकारी नियुक्त किया।

शनि की दृष्टि से जुड़ी कई पौराणिक कथाये है :

मुनि विश्वामित्र ने शनि की सहायता से हरिश्चन्द्र के जीवन में विपत्तियों का अम्बार लगा दिया। शनि ने राजा नल एवं दमयन्ती को कष्ट दिया।  कुमारी दमयन्ती ने स्वयंवर में राजा नल का वरण किया, जबकि वहाँ एक से एक देवता उपस्थित थे। 



शनि ने इसे देवताओं का अपमान समझकर दमयन्ती के आनन्दित दाम्पत्य जीवन में आग लगा दी। शनि ने रावण का भी सर्वनाश किया। श्रीराम के जीवन में भी वनवास के बाद घटने वाली समस्त घटनाओं के सूत्रधार शनि महाराज ही हैं। शनि ने महाभारत कराया। पाण्डवों को वनवास दिलाया। राजा विक्रमादित्य की साढ़ेसाती प्रसिद्ध है और उनके कष्टों का अम्बर शनि देव ने खड़ा किया। 


 शनि की साढ़ेसाती जीवन में कितने बार आते है और क्या परिणाम देते है :
शनि की साढ़ेसाती जीवन में अधिक से अधिक तीन बार आती है। दूसरी कष्टदायक होती है एवं तीसरी में मृत्यु सम्भव है।

शनि की साढ़ेसाती में करे ये उपाय :
कई कथाओ में उल्लेख अत है की शनि देव को शांत करने के लिए हनुमान जी की उपासना करे।  दमयन्ती ने अपने कस्तो की मुक्ति के लिए "शंकर सुवन केसरी नंदन "  हनुमान जी की एकनिष्ठ प्रार्थना की एवं धीरे-धीरे शनि का प्रभाव क्षीण हो गया।


 दोनों पति-पत्नी पुनः अपना राज्य एवं सुखमय जीवन प्राप्त कर लिये। कही कही उल्लेख आता है रावण ने शनिलोक पर आक्रमण कर महाकाल एवं शनिदेव को ब्रह्मा के वरदान के फलस्वरूप युद्ध में पराजित कर बन्दी बना लिया। दोनों को लंका में बन्दीगृह में स्थिर कर लिया। 




कहीं-कहीं लिखा है कि उलटा लटका दिया। लंकादहन के समय हनुमान जी ने दोनों को मुक्त किया तथा शनि ने हनुमान जी को वरदान दिया कि आपका भक्त मेरे द्वारा पीड़ित नहीं होगा। हनुमानजी शनि के ज्ञानगुरु हैं, अतः मृतसंजीवनी कवच, मृत्युज्जय कवच एवं महामृत्युजय जप अनुभूत प्रयोग है। सामान्य जन हेतु शनि चालीस श्रद्धापूर्वक करने पर सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। शनि यन्त्र की प्राण-प्रतिष्ठा कर शनि जप करने से भी शनिकोप शान्त होता है। 



सूर्य को अर्घ्य देने से अपेक्षित लाभ होता है। शनिवार को ही पीपल के पेड़ के चारों और ७ बार सूत लपेटें तथा उस समय शनि मन्त्र का जप करते रहें।वट एवं पीपल के पेड़ के नीचे सूर्योदय के पूर्व तेल का दीपक रखें तथा धूप, दूध आदि अर्पित करें। काली गौ की सेवा करें। बन्दरों एवं काले कुत्तों को लड्डू खिलाएँ। शनिवार को अपने हाथ की लम्बाई (नाप) का १९ हाथ काला माला बनाकर पहनें।



 काले घोड़े की नाल या नाव की सतह की कील से बना रिंग भी धारण किया जा सकता है। सूर्योदय के समय रवि दर्शन २१ दिनों तक करे। चोकर सहित आटे की दो रोटियाँ बनाकर एक पर तेल एवं दूसरी पर घी लगा कर, पहले वाली पर मीठा रखकर गाय को एवं दूसरी बाद में कुत्ते को खिलाएँ।

 गोचर के शनि का प्रभाव :

विद्वानों का मत है कि शनि जब रोहिणी का अतिक्रमण करता है, तो 'रोहिणी भेदन- योग' बनाता है, इसके फल से पृथ्वीलोक पर बारह वर्ष का दुर्भिक्ष पड़ता है। राजा दशरथ के समय यह योग उपस्थित होने पर मुनियों के अनुनय-विनय पर  दशरथ शनि को दण्ड देने के लिए नक्षत्र-लोक चले गये। दशरथ का पराक्रम देखकर शनिदेव हर्षित होकर दो वरदान दिये।




 संकटभेदन न करने का वचन दिया तथा कहा कि यदि किसी लग्न-चक्र में प्रथम, चतुर्थ एवं अष्टम में गोचर - वश मैं आऊँ, तो मृत्युतुल्य कष्ट प्राप्त होता है; परन्तु अगर व्यक्ति मेरी प्रतिमा निर्मित कर पूजा-अर्चना करे, वह भी तुम्हारे द्वारा विरचित स्तोत्र से, तो मैं उसे त्रास नहीं दूंगा।



 यही से दशरथ की लिखे स्तोत्र को लोगो ने पढ़ना सुरु कर दिया।
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